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अमृतसर और गुरदासपुर में पिछले वर्ष जैसी बाढ़ की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जल संसाधन विभाग ने रावी नदी में महत्वपूर्ण डी-सिल्टिंग कार्य में तेजी लाई

फोटो AI

अमृतसर, 5 जुलाई:पिछले वर्ष आई विनाशकारी बाढ़, जिसमें अनेक लोगों की जान गई और कृषि क्षेत्र को व्यापक नुकसान हुआ, के बाद पंजाब सरकार ने बाढ़ प्रबंधन एवं रोकथाम के लिए व्यापक कदम उठाए हैं। वर्ष 2023 और 2025 के दौरान सतलुज, ब्यास और रावी नदी प्रणालियों में आई भीषण बाढ़ के कारण 91 स्थानों पर तटबंधों में कटाव हुआ, नदी प्रशिक्षण एवं जल निकासी अवसंरचना को क्षति पहुँची, 86,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि प्रभावित हुई तथा लगभग ₹1,825.46 करोड़ के नुकसान का आकलन किया गया। पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण के लिए लगभग ₹11,855.65 करोड़ की आवश्यकता आंकी गई है।

अध्ययन में पाया गया कि नदियों में गाद और मलबे के अत्यधिक जमाव के कारण उनकी जल वहन क्षमता कम हो जाती है, जलभराव लंबे समय तक बना रहता है तथा बाढ़ की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए वैज्ञानिक तरीके से डी-सिल्टिंग करना बाढ़ जोखिम को कम करने का एक महत्वपूर्ण उपाय है।

इसी उद्देश्य से जल संसाधन विभाग द्वारा रावी नदी के धर्मकोट घोनेवाल कॉम्प्लेक्स में लक्षित डी-सिल्टिंग कार्य सक्रिय रूप से किया जा रहा है। इस रणनीतिक पहल का उद्देश्य नदी के महत्वपूर्ण जलमार्गों में आई रुकावटों को दूर करना, बाढ़ के पानी के निर्बाध प्रवाह को सुनिश्चित करना तथा नदी की जल वहन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि कर सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों को भविष्य में संभावित बाढ़ से सुरक्षित करना है।

पिछले वर्ष हुई क्षति की पृष्ठभूमि और व्यापकता

पिछले वर्ष के मानसून के दौरान इस क्षेत्र में अभूतपूर्व तबाही हुई। रावी नदी ने जिले में कुल 23 स्थानों पर तटबंधों को तोड़ दिया, जिससे अमृतसर जिले के 198 गांव सीधे प्रभावित हुए। इस बाढ़ से मानव जीवन और अर्थव्यवस्था दोनों को भारी क्षति पहुँची।

* मानवीय क्षति: 10 लोगों की दुखद मृत्यु हुई।
* कृषि को नुकसान: 59,793 एकड़ उपजाऊ फसल पूरी तरह नष्ट हो गई, जिससे किसानों की मौसमी आय समाप्त हो गई।
* पशुधन की हानि: बाढ़ के पानी में 307 पशुओं की मृत्यु हो गई।

केवल धर्मकोट घोनेवाल कॉम्प्लेक्स में ही तटबंध छह अलग-अलग स्थानों पर टूट गया था। बाढ़ का पानी उतरने के बाद बड़ी मात्रा में गाद तथा रिवर बेड मैटेरियल (RBM) नदी में जमा हो गया, जिससे नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ और उसकी जल वहन क्षमता काफी कम हो गई।

वैज्ञानिक सर्वेक्षण एवं अंतर-सरकारी स्वीकृतियां

इस समस्या के मूल कारणों का समाधान करने के लिए विभाग ने पूरे नदी क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण कर प्रमुख अवरोधों की पहचान की। इसके आधार पर भारत सरकार द्वारा जारी नेशनल फ्रेमवर्क फॉर सेडिमेंट मैनेजमेंट (NFSM) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) तैयार किया गया।

इस परियोजना की तकनीकी जांच एवं स्वीकृति संयुक्त स्टेट टेक्निकल एडवाइजरी कमेटी (STAC) द्वारा प्रदान की गई, जिसमें पंजाब सरकार और भारत सरकार के इंजीनियरिंग विशेषज्ञ शामिल हैं।

नियमानुसार कार्य निष्पादन एवं आपदा तैयारी

पूर्ण पारदर्शिता और नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए डी-सिल्टिंग कार्य की-होल मार्कअप लैंग्वेज (KML) आधारित डिजिटल जियो-फेंसिंग के माध्यम से किया जा रहा है। खुदाई के प्रत्येक चरण की विभाग द्वारा प्रत्यक्ष निगरानी की जा रही है ताकि समस्त कार्य केवल स्वीकृत सीमाओं के भीतर ही हो।

आपदा प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से खुदाई से निकाली गई गाद एवं अवसाद को निकटवर्ती सुरक्षित स्थानों पर संग्रहीत किया जा रहा है। इस सामग्री का उपयोग केवल आपातकालीन बाढ़ सुरक्षा उपायों के लिए किया जाएगा, जैसे—

* संवेदनशील एवं हाल ही में मरम्मत किए गए नदी तटबंधों को मजबूत करना।
* आपातकालीन नियंत्रण (EC) हेतु रेत की बोरियां भरना।
* अत्यधिक जल प्रवाह की स्थिति में तत्काल सुरक्षात्मक एवं लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराना।

सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता

जल संसाधन विभाग अमृतसर और गुरदासपुर जिलों के लोगों के जीवन, फसलों और आजीविका की सुरक्षा के लिए निर्धारित समय-सीमा के भीतर इस कार्य को तेजी से पूरा करने में जुटा हुआ है। धर्मकोट घोनेवाल कॉम्प्लेक्स की लगातार निगरानी की जा रही है तथा भारी मशीनरी के माध्यम से नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करने का कार्य जारी है, ताकि मानसून के चरम दौर से पहले नदी की जल वहन क्षमता में पर्याप्त वृद्धि सुनिश्चित की जा सके।

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