
अमृतसर, 26 सितंबर (राजन): प्रवास केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने का नाम नहीं है, बल्कि इसके साथ व्यक्ति की भाषा, संस्कृति, पारिवारिक संबंधों और पहचान से जुड़े कई पहलू भी बदलते हैं। आज विदेश जाने की दौड़ के बीच युवाओं के लिए अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहना भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ये विचार गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज की ओर से गुरु नानक भवन के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित ‘देश-परदेश: बोल, बोली और संस्कृति—पहचान की तलाश’ विषयक आउटरीच कार्यक्रम के दौरान सामने आए।
उप-कुलपति प्रो. (डॉ.) करमजीत सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत स्वागत के साथ हुई। स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के प्रमुख डॉ. जी.एस. बाजवा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रवास, भाषा, संस्कृति और पहचान से जुड़े बदलते सामाजिक संदर्भों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के शिक्षकों, कॉलेजों एवं स्कूलों के शिक्षकों तथा विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

डॉ. सुखदेव सिंह ने कहा कि प्रवास को केवल भौगोलिक बदलाव के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे रोजगार, शिक्षा, आर्थिक अपेक्षाएं, बुनियादी ढांचा, पारिवारिक परिस्थितियां और प्रशासन से जुड़े कई कारण होते हैं। उन्होंने गांवों से शहरों, एक राज्य से दूसरे राज्य और विदेशों की ओर हो रहे प्रवास के बदलते रुझानों पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि पंजाब में प्रवास के कारण कई गांवों में बुजुर्ग आबादी बढ़ने और गांवों के खाली होने जैसी स्थितियां भी सामने आ रही हैं।
डॉ. दविंदर सिंह जौहल ने चर्चा को मानवीय और मनोवैज्ञानिक पक्ष से जोड़ते हुए मानसिक स्वास्थ्य, आत्म-अनुशासन, पढ़ने, शौक और सार्थक गतिविधियों के महत्व पर बात की। उन्होंने साहित्य और कविता को मानवीय भावनाओं एवं विचारों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने इकबाल, मीर और जिगर मुरादाबादी जैसे शायरों का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य लंबे समय से मानवीय भावनाओं और मनोवैज्ञानिक अनुभवों को अपना विषय बनाता रहा है।
डॉ. जौहल ने मोबाइल फोन और डिजिटल तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के प्रभावों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि इसका अनावश्यक इस्तेमाल नींद, खान-पान, पढ़ाई, पारिवारिक संवाद और शारीरिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने युवाओं को आत्म-जिम्मेदारी, आत्म-नियंत्रण, स्वतंत्र सोच और स्वस्थ रुचियां विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विदेश जाने का फैसला भी केवल दूसरों की देखा-देखी नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया जाना चाहिए। उन्होंने प्रवास के लिए परिवारों द्वारा किए जाने वाले वित्तीय खर्चों का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्यार्थियों को विदेश जाने से पहले सामाजिक, पेशेवर और मनोवैज्ञानिक रूप से भी तैयार करना जरूरी है।
डॉ. बरिंदर कौर ने भाषा, शिक्षा और तैयारी के पक्ष पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि एक ओर अंग्रेजी भाषा के प्रशिक्षण और परीक्षाओं के लिए केंद्रों की मांग बढ़ रही है, जबकि दूसरी ओर शैक्षणिक संस्थानों को योग्य अंग्रेजी शिक्षक ढूंढने में कठिनाई हो रही है। उन्होंने कहा कि भाषाई तैयारी केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को समाज में आत्मविश्वास के साथ संवाद करने और भागीदारी करने में सक्षम बनाना भी इसका उद्देश्य होना चाहिए।
चेतन मोहन जोशी ने सामाजिक चेतना में सवाल करने और संवाद के महत्व पर जोर दिया। बोल, बोली और संस्कृति के आपसी संबंधों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सार्थक संवाद के लिए सवाल करने की क्षमता बेहद जरूरी है। डॉ. जगसीर सिंह ने विद्यार्थियों के साथ सवाल-जवाब के माध्यम से प्रवास के कारणों और इसके वास्तविक अर्थों को समझने का प्रयास किया। उन्होंने प्रवासियों के बच्चों की पहचान से जुड़े सवाल को भी चर्चा का हिस्सा बनाया। उन्होंने कहा कि विदेशों में जन्मे बच्चे अपने माता-पिता से भाषा, परंपराएं, त्योहार और यादें विरासत में प्राप्त करते हैं, लेकिन अगली पीढ़ी का अपनी विरासत के साथ संबंध पहली पीढ़ी से अलग हो सकता है। इस प्रकार प्रवासी परिवारों में पहचान की एक नई पीढ़ीगत समझ विकसित होती है।
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