
अमृतसर, 4 मई :गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में सरदार तेजा सिंह समुंदरी के जीवन और योगदान पर आधारित सेमिनार तथा पुस्तक विमोचन समारोह विश्वविद्यालय के गोल्डन जुबली कन्वेंशन सेंटर में आयोजित किया गया। इस अवसर पर डॉ. प्यार सिंह द्वारा लिखित तथा वाइस चांसलर प्रो. करमजीत सिंह द्वारा अंग्रेजी में अनूदित पुस्तक “तेजा सिंह समुंदरी: जीवन और योगदान” का विमोचन पंजाब के राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के चांसलर गुलाब चंद कटारिया, दिल्ली के उपराज्यपाल तरणजीत सिंह संधू, चंडीगढ़ के डीजीपी डॉ. सागरप्रीत सिंह हुड्डा तथा अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा किया गया।

मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए गुलाब चंद कटारिया ने सरदार तेजा सिंह समुंदरी की सिख सुधार आंदोलन में भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा कि युवाओं को ऐसी ऐतिहासिक शख्सियतों से परिचित कराना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संगत और पंगत जैसी परंपराएं समानता और साझीवालेपन पर आधारित हैं, जो वर्तमान और भविष्य दोनों में प्रासंगिक हैं तथा समाज में ऊंच-नीच के भेदभाव को समाप्त करती हैं।
उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक कथाओं और लेखन के माध्यम से ही हम अपने महान व्यक्तित्वों को याद रख सकते हैं। भारत की शक्ति उसकी लेखन परंपरा में निहित है, जिसने सदियों से राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखा है। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों के बलिदान केवल ऐतिहासिक घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे आज भी हमें समाज और देश के लिए निस्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाएं और देश की प्रगति में योगदान दें।

विशेष अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए तरणजीत सिंह संधू ने अपने दादा सरदार तेजा सिंह समुंदरी को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम केवल एक ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि विरासत पर विचार करने का अवसर है। उन्होंने बताया कि उनके दादा ने ब्रिटिश शासन के दबाव के आगे झुकने के बजाय लाहौर जेल में शहादत को स्वीकार किया।
उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में उनकी भूमिका संस्थाओं को मजबूत करने से जुड़ी रही। गुरु का बाग और चाबियां आंदोलन के दौरान अपनाई गई अहिंसा और अनुशासन की प्रशंसा महात्मा गांधी द्वारा भी की गई थी। उन्होंने युवाओं से ईमानदारी, जिम्मेदारी और निस्वार्थ सेवा के मूल मंत्र अपनाने का आह्वान किया।
वाइस चांसलर प्रो. करमजीत सिंह ने कहा कि यह पुस्तक प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. प्यार सिंह की रचना पर आधारित एक महत्वपूर्ण कृति है और इसका अंग्रेजी अनुवाद इस विरासत को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि अनुवाद की प्रक्रिया केवल अकादमिक नहीं, बल्कि एक आंतरिक अनुभव भी रही। उन्होंने कहा कि सरदार तेजा सिंह समुंदरी का जीवन सेवा, साहस और निष्ठा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि यह पुस्तक हमें अपने पूर्वजों के बलिदानों की याद दिलाती है और हमें प्रेरित करती है कि हम इस विरासत को न केवल संभालें, बल्कि आगे भी बढ़ाएं। यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम अपने इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
इस अवसर पर प्रिंसिपल डॉ. इंदरजीत सिंह गोगोआनी ने सरदार तेजा सिंह समुंदरी के योगदान पर विशेष व्याख्यान दिया, जबकि डॉ. अमरजीत सिंह ने पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत की। कार्यक्रम में डीन अकादमिक मामले प्रो. हरविंदर सिंह, रजिस्ट्रार प्रो. के.एस. चाहल, डीन छात्र कल्याण प्रो. सतनाम सिंह देओल, प्रोफेसर इंचार्ज लोक संपर्क डॉ. रविंदर कुमार, निदेशक लोक संपर्क श्री प्रवीण पुरी सहित अन्य विद्वानों, अध्यापकों और विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
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